आए मुट्ठी बंद लिए चल दिए हाथ पसार

वो क्या था जो लुट गया देखो सोच-विचार

जब तक उस से दूर थी मेरे थे सौ रंग

उस के रंग में रंग गई जब लागी पी संग

गुल दो-पहरी फूल ले जब तक फैली धूप

पूछेंगे अब शाम को कहाँ गया वो रूप

कैसे पानी में लिखूँ यहाँ कुशल सब भाँत

जब से बिछड़ी आप से बिछड़ गए सुख शांत