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एहतिशाम अख्तर

1944

ग़ज़ल 8

शेर 4

शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है

सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से

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मिरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ पाए कभी

मैं अपना हाल किसी अजनबी से क्या कहता

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सोच उन की कैसी है कैसे हैं ये दीवाने

इक मकाँ की ख़ातिर जो सौ मकाँ जलाते हैं

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तुम जलाना मुझे चाहो तो जला दो लेकिन

नख़्ल-ए-ताज़ा जो जलेगा तो धुआँ भी देगा

पुस्तकें 3

Neela Aakash

 

1984

Neela Aakash

 

1984

Rakh

 

 

 

चित्र शायरी 1

शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से