फरीहा नक़वी

ग़ज़ल 21

नज़्म 9

अशआर 18

हम तोहफ़े में घड़ियाँ तो दे देते हैं

इक दूजे को वक़्त नहीं दे पाते हैं

तुम्हारे रंग फीके पड़ गए नाँ?

मिरी आँखों की वीरानी के आगे

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दे रहे हैं लोग मेरे दिल पे दस्तक बार बार

दिल मगर ये कह रहा है सिर्फ़ तू और सिर्फ़ तू

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ज़माने अब तिरे मद्द-ए-मुक़ाबिल

कोई कमज़ोर सी औरत नहीं है

तुम्हें पता है मिरे हाथ की लकीरों में

तुम्हारे नाम के सारे हुरूफ़ बनते हैं

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