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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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Hasan Shahnawaz Zaidi's Photo'

हसन शाहनवाज़ ज़ैदी

1948 | लाहौर, पाकिस्तान

हसन शाहनवाज़ ज़ैदी के शेर

ये सूखे पत्ते नहीं ज़माने पे तब्सिरे हैं

शजर ने लिख कर बिखेर दी हैं फ़ज़ा में बातें

रहना पल पल ध्यान में

मिलना ईद के ईद में

वो मिरे कासे में यादें छोड़ कर यूँ चल दिया

जिस तरह अल्फ़ाज़ जाते हों मुआ'नी छोड़ कर

तितलियाँ फूल में क्या ढूँढती रहती हैं सदा

क्या कहीं बाद-ए-सबा रख गई पैग़ाम तिरा

चेहरों को पैरों से कुचल कर आगे बढ़ जाना

जीत इसी को कहते हैं तो फिर मैं हार गया

''जो भी आवे है वो नज़दीक ही बैठे है तिरे''

शीशा-ए-चश्म में किस किस को उतारा हुआ है

उस की आँखों में मोहब्बत का गुमाँ तक नहीं आज

कौन सी आग थी कल जिस का धुआँ तक नहीं आज

सहर होते ही जैसे रेत भर जाती है साँसों में

नसीम-ए-हिज्र तेरे ज़ाइक़े अच्छे नहीं लगते

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