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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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हसीब सोज़

ग़ज़ल 14

अशआर 9

ये बद-नसीबी नहीं है तो और फिर क्या है

सफ़र अकेले किया हम-सफ़र के होते हुए

यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है

कई झूटे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है

मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को

बाज़ लोगों ने तो बीमार समझ रक्खा है

ये इंतिक़ाम है या एहतिजाज है क्या है

ये लोग धूप में क्यूँ हैं शजर के होते हुए

वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया

लिबास पहने रहा और बदन उतार गया

पुस्तकें 18

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