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हाशिम रज़ा जलालपुरी

1987 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 29

शेर 5

गरेबाँ चाक, धुआँ, जाम, हाथ में सिगरेट

शब-ए-फ़िराक़, अजब हाल में पड़ा हुआ हूँ

महफ़िल में लोग चौंक पड़े मेरे नाम पर

तुम मुस्कुरा दिए मिरी क़ीमत यही तो है

सारी रुस्वाई ज़माने की गवारा कर के

ज़िंदगी जीते हैं कुछ लोग ख़सारा कर के

हम से आबाद है ये शेर-ओ-सुख़न की महफ़िल

हम तो मर जाएँगे लफ़्ज़ों से किनारा कर के

हम बे-नियाज़ बैठे हुए उन की बज़्म में

औरों की बंदगी का असर देखते रहे

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