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हिमायत अली शाएर

1926 - 2019 | टोरंटो, कनाडा

ग़ज़ल 30

शेर 25

इस जहाँ में तो अपना साया भी

रौशनी हो तो साथ चलता है

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तुझ से वफ़ा की तो किसी से वफ़ा की

किस तरह इंतिक़ाम लिया अपने आप से

'शाइर' उन की दोस्ती का अब भी दम भरते हैं आप

ठोकरें खा कर तो सुनते हैं सँभल जाते हैं लोग

अपने किसी अमल पे नदामत नहीं मुझे

था नेक-दिल बहुत जो गुनहगार मुझ में था

सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते

कुछ ग़म-ए-मोहब्बत हो कुछ ग़म-ए-जहाँ यारो

पुस्तकें 16

Aag Mein Phool

 

1981

Aag Mein Phool

 

1956

आईना दर आईना

Manzoom Khud Nawisht Sawaneh Hayaat

2001

Barish-e-Sang Se Barish-e-Gul Tak

 

2002

Every Word Aglow

 

1993

हर्फ़ हर्फ़ रौशनी

 

1986

Haroon Ki Aawaz

 

1985

Haroon Ki Awaz

 

1988

Himayat Ali Shair Ke Drame

 

2005

मिट्टी का क़र्ज़

 

1980

वीडियो 13

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

हिमायत अली शाएर

हिमायत अली शाएर

अन-कही

तुझ को मालूम नहीं तुझ को भला क्या मालूम हिमायत अली शाएर

अब बताओ जाएगी ज़िंदगी कहाँ यारो

हिमायत अली शाएर

आईना-दर-आईना

इस बार वो मिला तो अजब उस का रंग था हिमायत अली शाएर

उस के ग़म को ग़म-ए-हस्ती तू मिरे दिल न बना

हिमायत अली शाएर

कब तक रहूँ मैं ख़ौफ़-ज़दा अपने आप से

हिमायत अली शाएर

दस्तक हवा ने दी है ज़रा ग़ौर से सुनो

हिमायत अली शाएर

बदन पे पैरहन-ए-ख़ाक के सिवा क्या है

हिमायत अली शाएर

बदन पे पैरहन-ए-ख़ाक के सिवा क्या है

हिमायत अली शाएर

ऑडियो 10

अब बताओ जाएगी ज़िंदगी कहाँ यारो

आँख की क़िस्मत है अब बहता समुंदर देखना

इस दश्त पे एहसाँ न कर ऐ अब्र-ए-रवाँ और

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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