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होश जौनपुरी

1940 - 2003 | जौनपुर, भारत

ना’त, मन्क़बत, सलाम, मर्सिये और क़सीदे जैसी विधाओं में शायरी की

ना’त, मन्क़बत, सलाम, मर्सिये और क़सीदे जैसी विधाओं में शायरी की

होश जौनपुरी के शेर

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ख़ुदा बदल सका आदमी को आज भी 'होश'

और अब तक आदमी ने सैकड़ों ख़ुदा बदले

दीवार उन के घर की मिरी धूप ले गई

ये बात भूलने में ज़माना लगा मुझे

क्या सितम करते हैं मिट्टी के खिलौने वाले

राम को रक्खे हुए बैठे हैं रावण के क़रीब

मिट्टी में कितने फूल पड़े सूखते रहे

रंगीन पत्थरों से बहलता रहा हूँ मैं

आदमी पहले भी नंगा था मगर जिस्म तलक

आज तो रूह को भी हम ने बरहना पाया

ज़िक्र-ए-अस्लाफ़ से बेहतर है कि ख़ामोश रहें

कल नई नस्ल में हम लोग भी बूढ़े होंगे

टूट कर रूह में शीशों की तरह चुभते हैं

फिर भी हर आदमी ख़्वाबों का तमन्नाई है

डूबने वाले को साहिल से सदाएँ मत दो

वो तो डूबेगा मगर डूबना मुश्किल होगा

हम भी करते रहें तक़ाज़ा रोज़

तुम भी कहते रहो कि आज नहीं

बच्चे खुली फ़ज़ा में कहाँ तक निकल गए

हम लोग अब भी क़ैद इसी बाम-ओ-दर में हैं

जो साए बिछाते हैं फल फूल लुटाते हैं

अब ऐसे दरख़्तों को इंसान कहा जाए

मेरे ही पाँव मिरे सब से बड़े दुश्मन हैं

जब भी उठते हैं उसी दर की तरफ़ जाते हैं

जो हादिसा कि मेरे लिए दर्दनाक था

वो दूसरों से सुन के फ़साना लगा मुझे

साग़र नहीं कि झूम के उट्ठे उठा लिया

ये ज़िंदगी का बोझ है मिल कर उठाइए

खो गई जा के नज़र यूँ रुख़-ए-रौशन के क़रीब

जैसे खो जाती है बेवा कोई दुल्हन के क़रीब

जाने किस किस का गला कटता पस-ए-पर्दा-ए-इश्क़

खुल गए मेरी शहादत में सितमगर कितने

आने वाले दौर में जो पाएगा पैग़म्बरी

मेरा चेहरा मेरा दिल मेरी ज़बाँ ले जाएगा

गिर भी जाती नहीं कम-बख़्त कि फ़ुर्सत हो जाए

कौंदती रहती है बिजली मिरे ख़िर्मन के क़रीब

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