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इफ़्तिख़ार मुग़ल

1961 | पाकिस्तान

इफ़्तिख़ार मुग़ल

ग़ज़ल 10

अशआर 14

किसी सबब से अगर बोलता नहीं हूँ मैं

तो यूँ नहीं कि तुझे सोचता नहीं हूँ मैं

हम ने उस चेहरे को बाँधा नहीं महताब-मिसाल

हम ने महताब को उस रुख़ के मुमासिल बाँधा

मोहब्बत और इबादत में फ़र्क़ तो है नाँ

सो छीन ली है तिरी दोस्ती मोहब्बत ने

ख़ुदा! सिला दे दुआ का, मोहब्बतों के ख़ुदा

ख़ुदा! किसी ने किसी के लिए दुआ की थी

घेर लेती है कोई ज़ुल्फ़, कोई बू-ए-बदन

जान कर कोई गिरफ़्तार नहीं होता यार

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए