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इफ़्तिख़ार नसीम

1946 - 2011 | संयुक्त राज्य अमेरिका

समलैंगिकता के विषय पर अपनी बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध

समलैंगिकता के विषय पर अपनी बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 32

नज़्म 1

 

शेर 21

उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा

आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा

अगरचे फूल ये अपने लिए ख़रीदे हैं

कोई जो पूछे तो कह दूँगा उस ने भेजे हैं

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मुझ से नफ़रत है अगर उस को तो इज़हार करे

कब मैं कहता हूँ मुझे प्यार ही करता जाए

पुस्तकें 1

Shumara Number-010,011

1992

 

चित्र शायरी 3

उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ आम से कपड़ों में था वो फिर भी शहज़ादा लगा हर घड़ी तय्यार है दिल जान देने के लिए उस ने पूछा भी नहीं ये फिर भी आमादा लगा कारवाँ है या सराब-ए-ज़िंदगी है क्या है ये एक मंज़िल का निशाँ इक और ही जादा लगा रौशनी ऐसी अजब थी रंग-भूमी की 'नसीम' हो गए किरदार मुदग़म कृष्ण भी राधा लगा

 

ऑडियो 11

उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा

ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे

जिला-वतन हूँ मिरा घर पुकारता है मुझे

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI