जगत मोहन लाल रवाँ
ग़ज़ल 11
नज़्म 1
अशआर 12
सामने तारीफ़ ग़ीबत में गिला
आप के दिल की सफ़ाई देख ली
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वो ख़ुश हो के मुझ से ख़फ़ा हो गया
मुझे क्या उमीदें थीं क्या हो गया
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उस को ख़िज़ाँ के आने का क्या रंज क्या क़लक़
रोते कटा हो जिस को ज़माना बहार का
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तोड़ा है दम अभी अभी बीमार-ए-हिज्र ने
आए मगर हुज़ूर को ताख़ीर हो गई
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क़ितआ 2
रुबाई 9
पुस्तकें 7
ऑडियो 3
'रवाँ' किस को ख़बर उनवान-ए-आग़ाज़-ए-जहाँ क्या था
राह-ओ-रस्म-ए-इब्तिदाई देख ली
वो ख़ुश हो के मुझ से ख़फ़ा हो गया
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