Jameeluddin Aali's Photo'

जमीलुद्दीन आली

1925 - 2015 | कराची, पाकिस्तान

अपने दोहों के लिए मशहूर।

अपने दोहों के लिए मशहूर।

जमीलुद्दीन आली

ग़ज़ल 42

शेर 9

तेरे ख़याल के दीवार-ओ-दर बनाते हैं

हम अपने घर में भी तेरा ही घर बनाते हैं

बिखेरते रहो सहरा में बीज उल्फ़त के

कि बीज ही तो उभर कर शजर बनाते हैं

कुछ छोटे छोटे दुख अपने कुछ दुख अपने अज़ीज़ों के

इन से ही जीवन बनता है सो जीवन बन जाएगा

अजनबियों से धोके खाना फिर भी समझ में आता है

इस के लिए क्या कहते हो वो शख़्स तो देखा-भाला था

क्या क्या रोग लगे हैं दिल को क्या क्या उन के भेद

हम सब को समझाने वाले कौन हमें समझाए

दोहा 21

हर इक बात में डाले है हिन्दू मुस्लिम की बात

ये ना जाने अल्हड़ गोरी प्रेम है ख़ुद इक ज़ात

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उर्दू वाले हिन्दी वाले दोनों हँसी उड़ाएँ

हम दिल वाले अपनी भाषा किस किस को सिखलाएँ

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'आली' अब के कठिन पड़ा दीवाली का त्यौहार

हम तो गए थे छैला बन कर भय्या कह गई नार

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साजन हम से मिले भी लेकिन ऐसे मिले कि हाए

जैसे सूखे खेत से बादल बिन बरसे उड़ जाए

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नींद को रोकना मुश्किल था पर जाग के काटी रात

सोते में जाते वो तो नीची होती बात

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पुस्तकें 109

Anjuman Taraqqi Urdu Ka Alamiya

 

2002

Armughan-e-Aali

Jameeluddin Aali Fan Aur Shakhsiyat

1998

दोहे

 

2003

दोहे

 

1984

Duniya Mere Aage

 

1984

Ghazlein Dohe Geet

 

1957

ग़ज़लें दोहे गीत

 

1984

Harf-e-Chand

Anjuman Ki Ek Sau Chaar Kitabon Ke Muqaddme

1988

जमीलुद्दीन अाली फ़न और शख़्सियत

 

1988

जमीलुद्दीन अाली की नस्र निगारी

 

1993

चित्र शायरी 4

प्यार करे और सिसकी भरे फिर सिसकी भर कर प्यार क्या जाने कब इक इक कर के भाग गए सब यार

ये जो बढ़ती हुई जुदाई है शायद आग़ाज़-ए-बे-वफ़ाई है तू न बदनाम हो उसी ख़ातिर सारी दुनिया से आश्नाई है किस क़दर कश्मकश के बा'द खुला इश्क़ ही इश्क़ से रिहाई है शाम-ए-ग़म मैं तो चाँद हूँ उस का मेरे घर क्या समझ के आई है ज़ख़्म-ए-दिल बे-हिजाब हो के उभर कोई तक़रीब-ए-रू-नुमाई है उठता जाता है हौसलों का भरम इक सहारा शिकस्ता-पाई है जान 'आली' नहीं पड़ी आसाँ मौत रो रो के मुस्कुराई है

'आली' अब के कठिन पड़ा दीवाली का त्यौहार हम तो गए थे छैला बन कर भय्या कह गई नार

 

वीडियो 24

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

जमीलुद्दीन आली

जमीलुद्दीन आली

Aali recites his ghazal "Gilla Nahin Jo Be Da Nawar Guzre Hein"

जमीलुद्दीन आली

Aali recites his Ghazal "Tou Kiya Wo Humko Herr Ik Jurm Ki Saza De Ga"

जमीलुद्दीन आली

Aalijee recites his ghazal he wrote in 1980 for his wife Tayyaba on their 67th wedding anniversary on 30th September-2011

जमीलुद्दीन आली

At a mushaira

जमीलुद्दीन आली

Great doha in Aali sahib's unique style.

जमीलुद्दीन आली

Jameeluddin Aali in Houston-2000

जमीलुद्दीन आली

Jameeluddin Aali in Houston-2000(Jeevay Pakistan)

जमीलुद्दीन आली

Jamil-uddin Aali - Doaha aur Ghazal

जमीलुद्दीन आली

Jamiluddin Aali 20 Jan-X.AVI

जमीलुद्दीन आली

Jamiluddin Aali in Mehfil e Mushaira held at Michigan, USA

जमीलुद्दीन आली

Jamiluddin Aali Recites His CLASSIC Ghazal of 1978

जमीलुद्दीन आली

Reciting own poetry

जमीलुद्दीन आली

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