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जावेद नासिर

1949 - 2006

ग़ज़ल 22

नज़्म 6

शेर 12

खुलती हैं आसमाँ में समुंदर की खिड़कियाँ

बे-दीन रास्तों पे कहीं अपना घर तो है

उठ उठ के आसमाँ को बताती है धूल क्यूँ

मिट्टी में दफ़्न हो गए कितने सदफ़ यहाँ

किन किन की आत्माएँ पहाड़ों में क़ैद हैं

आवाज़ दो तो बजते हैं पत्थर के दफ़ यहाँ

ई-पुस्तक 4

Talafi

 

1977

Talafi

 

 

ताज़ियाना

 

2006

Naya Waraq,Mumbai

Gosha-e-Javed Nasir : Shumara Number-024

2006

 

ऑडियो 4

घर की तसल्लियों में जवाज़-ए-हुनर तो है

दुनिया है तेज़ धूप समुंदर है जैसे तू

बहुत उदास था उस दिन मगर हुआ क्या था

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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