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जाज़िब क़ुरैशी

1940 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 21

शेर 9

क्यूँ माँग रहे हो किसी बारिश की दुआएँ

तुम अपने शिकस्ता दर-ओ-दीवार तो देखो

तेरी यादों की चमकती हुई मशअ'ल के सिवा

मेरी आँखों में कोई और उजाला ही नहीं

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दफ़्तर की थकन ओढ़ के तुम जिस से मिले हो

उस शख़्स के ताज़ा लब-ओ-रुख़्सार तो देखो

मिरी शाइ'री में छुप कर कोई और बोलता है

सर-ए-आइना जो देखूँ तो वो शख़्स दूसरा है

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देख ले ज़रा कर आँसुओं के आईने

मैं सजा के पलकों पर तेरा प्यार लाया हूँ

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पुस्तकें 4

Shairi Aur Tahzeeb

 

1988

शनासाई

 

1973

Shanasai

 

1984

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1991

 

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