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कौसर सीवानी

1933

ग़ज़ल 10

शेर 7

मैं तो क़ाबिल था उन के दीदार के

उन की चौखट पे मेरी ख़ता ले गई

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हमें जो फ़िक्र की दावत दे सके 'कौसर'

वो शेर शेर तो है रूह-ए-शाएरी तो नहीं

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ज़िंदगी कुछ तो भरम रख ले वफ़ादारी का

तुझ को मर मर के शब-ओ-रोज़ सँवारा है बहुत

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ई-पुस्तक 2

Aks-e-Takhyeel

 

1981