ख़ावर जीलानी
ग़ज़ल 13
अशआर 14
सभी किरदार थक कर सो गए हैं
मगर अब तक कहानी चल रही है
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वक़्त गुज़र जाता है लेकिन दिल की रंजिश
दिल में बैठी की बैठी ही रह जाती है
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इक चिंगारी आग लगा जाती है बन में और कभी
एक किरन से ज़ुल्मत को छट जाना पड़ता है
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जीना तो अलग बात है मरना भी यहाँ पर
हर शख़्स की अपनी ही ज़रूरत के लिए है
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यूँही बेकार मैं पड़ा ख़ुद को
कार-आमद बना रहा हूँ मैं
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