ग़ज़ल 18

शेर 12

मुझे इस ख़्वाब ने इक अर्से तक बे-ताब रक्खा है

इक ऊँची छत है और छत पर कोई महताब रक्खा है

हाथ लगाते ही मिट्टी का ढेर हुए

कैसे कैसे रंग भरे थे ख़्वाबों में

मिरे सेहन पर खुला आसमान रहे कि मैं

उसे धूप छाँव में बाँटना नहीं चाहता

पुस्तकें 3

Nairang-e-Ghazal

Part-002

2018

Nairang-e-Ghazal

Part-003

2018

Nairang-e-Ghazal

Part-001

2018

 

ऑडियो 6

कभी मैं चुप कभी हर्फ़-ए-बयाँ में रहता हूँ

कहीं रुकने लगी है कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ शायद

दरून-ए-जाँ का शगूफ़ा जला हुआ निकला

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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