ख़ुशबीर सिंह शाद
ग़ज़ल 27
अशआर 36
ये तेरा ताज नहीं है हमारी पगड़ी है
ये सर के साथ ही उतरेगी सर का हिस्सा है
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ज़रा ये धूप ढल जाए तो उन का हाल पूछेंगे
यहाँ कुछ साए अपने आप को पैकर बताते हैं
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कुछ तलब में भी इज़ाफ़ा करती हैं महरूमियाँ
प्यास का एहसास बढ़ जाता है सहरा देख कर
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रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले
बहुत तड़पी कोई आवाज़ मरने से ज़रा पहले
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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

Khushbir Singh better known as Khushbir Singh "Shaad" is one of the popular Urdu Poets of the present era. The simplicity and sensitivity of his personality has a great impact on his writing that could obviously be felt by readers. Rekhta.org makes available ghazals, sher, shayari, nazms available in Hindi, English and Roman scripts. http://rekhta.org ख़ुशबीर सिंह शाद

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