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कृष्ण अदीब

1915 - 1999

ग़ज़ल 7

शेर 3

शो-केस में रक्खा हुआ औरत का जो बुत है

गूँगा ही सही फिर भी दिल-आवेज़ बहुत है

धीमा धीमा दर्द सुहाना हम को अच्छा लगता था

दुखते जी को और दुखाना हम को अच्छा लगता था

पुश्त पर क़ातिल का ख़ंजर सामने अंधा कुआँ

बच के जाऊँ किस तरफ़ अब रास्ता कोई नहीं

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