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कृष्ण बिहारी नूर

1926 - 2003 | लखनऊ, भारत

लोकप्रिय शायर, लखनवी भाषा-संस्कृति के नुमाइंदे।

लोकप्रिय शायर, लखनवी भाषा-संस्कृति के नुमाइंदे।

कृष्ण बिहारी नूर

ग़ज़ल 30

अशआर 13

मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा

सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए

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आइना ये तो बताता है कि मैं क्या हूँ मगर

आइना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में

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ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

और क्या जुर्म है पता ही नहीं

चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो

आइना झूट बोलता ही नहीं

कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए

आँखें जो बंद हों तो वो जल्वा दिखाई दे

पुस्तकें 5

 

वीडियो 6

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Nazar mila na sake us se us nigaah ke baad

कृष्ण बिहारी नूर

Reading his poetry at a mushaira

कृष्ण बिहारी नूर

Wo kya hai, kaun hai, kaise koi nazar jaane

कृष्ण बिहारी नूर

इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तक़ाज़ा है बहुत

कृष्ण बिहारी नूर

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

कृष्ण बिहारी नूर

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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