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महबूब ख़िज़ां

1930 - 2013 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तान में नई ग़ज़ल के प्रतिष्ठित शायर

पाकिस्तान में नई ग़ज़ल के प्रतिष्ठित शायर

महबूब ख़िज़ां

ग़ज़ल 21

शेर 24

हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

जीने की शिकायत है तो मर क्यूँ नहीं जाते

मिरी निगाह में कुछ और ढूँडने वाले

तिरी निगाह में कुछ और ढूँडता हूँ मैं

एक मोहब्बत काफ़ी है

बाक़ी उम्र इज़ाफ़ी है

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देखते हैं बे-नियाज़ाना गुज़र सकते नहीं

कितने जीते इस लिए होंगे कि मर सकते नहीं

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तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें

कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है

पुस्तकें 2

अकेली बस्तियाँ

 

1979

Teen Kitabein

Akeli Bastiyan, Gul-e-Aagahi, Khwab Numa

1963

 

चित्र शायरी 3

ये जो हम कभी कभी सोचते हैं रात को रात क्या समझ सके इन मुआमलात को हुस्न और नजात में फ़स्ल-ए-मश्रिक़ैन है कौन चाहता नहीं हुस्न को नजात को ये सुकून-ए-बे-जिहत ये कशिश अजीब है तुझ में बंद कर दिया किस ने शश-जहात को साहिल-ए-ख़याल पर कहकशाँ की छूट थी एक मौज ले गई इन तजल्लियात को आँख जब उठे भर आए शेर अब कहा न जाए कैसे भूल जाए वो भूलने की बात को देख ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है किस ने बा-ख़बर किया दूसरे की ज़ात को क्या ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है किस ने बा-ख़बर कहा दूसरे की ज़ात को क्या हुईं रिवायतें अब हैं क्यूँ शिकायतें इशक़-ए-ना-मुराद से हुस्न-ए-बे-सबात को ऐ बहार-ए-सर-गिराँ तू ख़िज़ाँ-नसीब है और हम तरस गए तेरे इल्तिफ़ात को

 

वीडियो 7

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

महबूब ख़िज़ां

महबूब ख़िज़ां

अकेली बस्तियाँ

बे-कस चमेली फूले अकेली आहें भरे दिल-जली महबूब ख़िज़ां

चाही थी दिल ने तुझ से वफ़ा कम बहुत ही कम

महबूब ख़िज़ां

दीवार से गुफ़्तुगू

किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर महबूब ख़िज़ां

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