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महफूजुर्रहमान आदिल

महफूजुर्रहमान आदिल

ग़ज़ल 1

 

शेर 36

वक़्त की गर्दिशों का ग़म करो

हौसले मुश्किलों में पलते हैं

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सामने माँ के जो होता हूँ तो अल्लाह अल्लाह

मुझ को महसूस ये होता है कि बच्चा हूँ अभी

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मत बैठ आशियाँ में परों को समेट कर

कर हौसला कुशादा फ़ज़ा में उड़ान का

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आप नूर-अफ़शाँ हैं रात के अँधेरे में

या सितारे रक़्साँ हैं रात के अँधेरे में

तुम्हारी मस्त आँखों का तसव्वुर

मिरी तौबा से टकराने लगा है

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