मजीद लाहौरी के शेर
चीन ओ अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा
रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा
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मुर्ग़ियाँ कोफ़ते मछली भुने तीतर अंडे
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-ग़िज़ा मेरे बाद
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फ़ातिहा-ख़्वानी में अहबाब उड़ाएँगे पोलाव
और करेंगे मिरी बख़्शिश की दुआ मेरे ब'अद
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कल ये इक ऊँट से कहता था शुतुरबान 'मजीद'
कौन होगा तिरे ग़मज़ों पे फ़िदा मेरे ब'अद
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जहाँ रहती थी ''ज़ोहरा-जान'' कभी
पीर-साहिब का आस्ताना हुआ
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