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माजिद-अल-बाक़री

ग़ज़ल 13

नज़्म 1

 

शेर 10

बीस बरस से इक तारे पर मन की जोत जगाता हूँ

दीवाली की रात को तू भी कोई दिया जलाया कर

क़रीब देख के उस को ये बात किस से कहूँ

ख़याल दिल में जो आया गुनाह जैसा था

मुझी से पूछ रहा था मिरा पता कोई

बुतों के शहर में मौजूद था ख़ुदा कोई

ई-पुस्तक 1

Taak Jhank

 

1967