मारूफ़ देहलवी
अशआर 17
हवा के घोड़े पे जब वो सवार होते हैं
तो पा के वक़्त मैं क्या क्या मज़े उड़ाता हूँ
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तेरी आँखों के तसव्वुर में है सैर-ए-कौनैन
वर्ना हम लोग इधर के इधर हो के रहते
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का'बा-ओ-दैर को अपना तो यहीं से है सलाम
दर-ब-दर कौन फिरे यार के दर के होते
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