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मीर मेहदी मजरूह

1833 - 1903 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 19

शेर 37

चुरा के मुट्ठी में दिल को छुपाए बैठे हैं

बहाना ये है कि मेहंदी लगाए बैठे हैं

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ये जो चुपके से आए बैठे हैं

लाख फ़ित्ने उठाए बैठे हैं

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क्या हमारी नमाज़ क्या रोज़ा

बख़्श देने के सौ बहाने हैं

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रुबाई 7

पुस्तकें 4

दीवान-ए-मजरूह

 

1889

Deewan-e-Majrooh

 

1898

Deewan-e-Majrooh

 

1978

Meer Mehdi Majrooh : Hayat Aur Tasneef

 

1999

 

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