मोहम्मद ताहा खान के शेर
वही है इख़्तिलाफ़-ए-बाहमी की अंजुमन अब तो
फ़क़त शादी के दिन उस ने मिलाई हाँ में हाँ मेरी
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दौर-ए-जम्हूरी में बंगलादेश जाना था तुझे
अक्सरिय्यत छोड़ कर ज़ालिम इधर पैदा हुआ
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इस दफ़अ बच्चा समझ कर छोड़े देता हूँ तुझे
मार डालूँगा अगर बार-ए-दिगर पैदा हुआ
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जान-ए-इज़राईल अब नख़रों का तेरे ग़म करूँ
या मैं तुझ पर सूरा-ए-यासीन पढ़ कर दम करूँ
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हाए क़िस्मत जनवरी माँगी तो जुलाई मिली
हाल का तालिब हुआ माज़ी तमन्नाई मिली
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सबब इस का जो पूछा डॉक्टर-साहब ने फ़रमाया
बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं
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लड़ी इस ठाट से मनकूहा-ए-काफ़िर-बयाँ मेरी
फ़रिश्ते लिखते लिखते छोड़ भागे दास्ताँ मेरी
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सहर से शाम तक चलती रही है चाय पर चाय
न ये बे-कार बैठे हैं न वो बे-कार बैठे हैं
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