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मुबारक शमीम

1924 - 2007 | शाहजहाँपुर, भारत

मुबारक शमीम

ग़ज़ल 14

अशआर 12

क्या ख़बर कब क़ैद-ए-बाम-ओ-दर से उक्ता जाए दिल

बस्तियों के दरमियाँ सहरा भी होना चाहिए

उस को धुँदला सकेगा कभी लम्हों का ग़ुबार

मेरी हस्ती का वरक़ यूँही खुला रहने दे

बोल किस मोड़ पे हूँ कश्मकश-ए-मर्ग-ओ-हयात

ऐसे आलम में कहाँ छोड़ दिया है मुझ को

नज़र आती नहीं हैं कम-नज़र को

सराबों के जिगर में नद्दियाँ हैं

जो साया-दार शजर थे वो सर्फ़-ए-दार हुए

दिखाई देते नहीं दूर दूर तक साए

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