मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र
ग़ज़ल 20
अशआर 4
हम तल्ख़ी-ए-हयात को आसाँ न कर सके
सहरा-ए-ज़िंदगी को गुलिस्ताँ न कर सके
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere