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नसीम भरतपूरी

1861 - 1909

नसीम भरतपूरी

ग़ज़ल 25

अशआर 18

शराब-ए-मोहब्बत को ज़ाहिदो तुम

बुरा गर कहोगे तो अच्छा होगा

मुँह मेरी तरफ़ है तो नज़र ग़ैर की जानिब

करते हैं किधर बात किधर देख रहे हैं

अपनी महफ़िल में मुझे देख के कहता है वो बुत

क्यूँ मिरे घर में मुसलमान चले आते हैं

तसल्लियाँ भी नहीं उन की छेड़ से ख़ाली

रुला के छोड़ते हैं वो हँसा हँसा के मुझे

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चराग़-ए-शाम-ए-ग़रीबी था में ज़माने में

किसी ने के ठंडा किया जला के मुझे

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