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नासिर शहज़ाद

1937 - 2007 | ओकाड़ा, पाकिस्तान

नासिर शहज़ाद

ग़ज़ल 44

अशआर 32

फिर यूँ हुआ कि मुझ से वो यूँही बिछड़ गया

फिर यूँ हुआ कि ज़ीस्त के दिन यूँही कट गए

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अख़रोट खाएँ तापें अँगेठी पे आग

रस्ते तमाम गाँव के कोहरे से अट गए

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जब कि तुझ बिन नहीं मौजूद कोई

अपने होने का यक़ीं कैसे करूँ

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तुझ से बिछड़े गाँव छूटा शहर में कर बसे

तज दिए सब संगी साथी त्याग डाला देस भी

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तुझ से मिली निगाह तो देखा कि दरमियाँ

चाँदी के आबशार थे सोने की राह थी

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