नज़र बर्नी के शेर
दस बच्चों के अब्बा हैं मगर है यही ख़्वाहिश
हर वक़्त ही बैठी रहे लैला मिरे आगे
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अब बच के कहाँ जाए हर इक सम्त है दीवार
बीवी मिरे पीछे है तो बच्चा मिरे आगे
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किसी को दे के ''वोट'' अपना नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो?
जो सर ख़ाली हो ''भेजे'' से तो फिर मुँह में ज़बान क्यूँ हो?
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है बजा काम की चोरी में तो मशहूर हैं हम
पेट रिश्वत से जो भरते हैं तो मजबूर हैं हम
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''क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम''
चला है जिस पे ''बुलडोज़र'' वो मेरा ही मकाँ क्यूँ हो?
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'नज़र' ने उन को जब देखा तो डैडी साथ थे उन के
हमारे दरमियाँ हर वक़्त वो पीर-ए-मुग़ाँ क्यूँ हो?
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