नाज़िम सुल्तानपूरी के शेर
अपनी संजीदा तबीअत पे तो अक्सर 'नाज़िम'
फ़िक्र के शोख़ उजाले भी गिराँ होते हैं
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फ़िक्र के शोख़ उजाले भी गिराँ होते हैं
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बड़े क़लक़ की बात है कि तुम इसे न पढ़ सके
हमारी ज़िंदगी तो इक खुली हुई किताब थी
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हमारी ज़िंदगी तो इक खुली हुई किताब थी
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कितनी वीरान है गली दिल की
दूर तक कोई नक़्श-ए-पा भी नहीं
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इक़तिज़ा वक़्त का जो चाहे करा ले वर्ना
हम न थे ग़ैर के एहसान उठाने वाले
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हम न थे ग़ैर के एहसान उठाने वाले
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