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रविश सिद्दीक़ी

1909 - 1971 | शाहजहाँपुर, भारत

अर्ध-क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख लोकप्रिय शायर

अर्ध-क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख लोकप्रिय शायर

ग़ज़ल 39

नज़्म 1

 

शेर 18

हज़ार रुख़ तिरे मिलने के हैं मिलने में

किसे फ़िराक़ कहूँ और किसे विसाल कहूँ

उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है

वो शख़्स मोहज़्ज़ब है जिस को ये ज़बाँ आई

दिल गवारा नहीं करता है शिकस्त-ए-उम्मीद

हर तग़ाफ़ुल पे नवाज़िश का गुमाँ होता है

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पुस्तकें 7

अफ़्सून-ए-तकल्लुम

 

2013

कारवाँ

 

1950

Karwan

 

1950

Khayaban Khayaban

 

1975

मेहराब-ए-ग़ज़ल

 

1956

रविश सिद्दीक़ी: हालात-ए-ज़िन्दगी और तन्क़ीदी-ओ-तअस्सुराती मज़ामीन

 

 

 

ऑडियो 4

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

तुझ पे खुल जाए कि क्या मेहर को शबनम से मिला

नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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