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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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सबा अफ़ग़ानी

1922 - 1976 | रामपुर, भारत

ग़ज़ल के शायर और फ़िल्मी गीतकार

ग़ज़ल के शायर और फ़िल्मी गीतकार

सबा अफ़ग़ानी

ग़ज़ल 7

अशआर 3

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है

जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है

जो के रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है

जो अश्क छलके आँखों से उस अश्क की क़ीमत होती है

करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू

फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ से नादाँ तौहीन-ए-मोहब्बत होती है

 

पुस्तकें 2

 

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