ग़ज़ल 46

शेर 47

इंतिज़ार करो इन का अज़ा-दारो

शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

हवा बिखेर गई मोम-बत्तियाँ और फूल

शाम से पहले तिरी शाम होने दूँगा

ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम होने दूँगा

पुस्तकें 1

Pataal

 

1987

 

वीडियो 3

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ऑडियो 8

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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