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शाद आरफ़ी

1900 - 1964 | रामपुर, भारत

नई विचार-दिशा देने वाले शायरों में विख्यात।

नई विचार-दिशा देने वाले शायरों में विख्यात।

ग़ज़ल 32

शेर 11

'शाद' ग़ैर-मुमकिन है शिकवा-ए-बुताँ मुझ से

मैं ने जिस से उल्फ़त की उस को बा-वफ़ा पाया

कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी

कैसे कहूँ किसी की तमन्ना चाहिए

तुम सलामत रहो क़यामत तक

और क़यामत कभी आए 'शाद'

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देख कर शाइ'र ने उस को नुक्ता-ए-हिकमत कहा

और बे-सोचे ज़माने ने उसे ''औरत'' कहा

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रंग लाएगी हमारी तंग-दस्ती एक दिन

मिस्ल-ए-ग़ालिब 'शाद' गर सब कुछ उधार आता गया

पुस्तकें 14

Aik tha Shayer

 

1967

कुल्लियात-ए-शाद आरफ़ी

 

1975

Makateeb-o-Mazameen-e-Shad Arifi

 

2016

Nasr-o-Ghazaldasta

 

1967

सफ़ीना चाहिए

 

1965

Safeena Chahiye

 

1965

Samaj

 

 

शाद अार्फ़ी की ग़ज़लें

 

1974

Shad Aarfi

 

1956

Shad Aarfi : Hayat, Shairi, Intikhab-e-Kulliyat

 

1988

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