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शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल 57
नज़्म 1
अशआर 43
ये बज़्म-ए-मय है याँ कोताह-दस्ती में है महरूमी
जो बढ़ कर ख़ुद उठा ले हाथ में मीना उसी का है
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अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया
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दिल-ए-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनक़-ए-बज़्म
मैं ख़ुद आया नहीं लाया गया हूँ
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तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ
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ऑडियो 10
ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम
कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था
ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया
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