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शाहिद कमाल

1982 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 38

शेर 4

जंग का शोर भी कुछ देर तो थम सकता है

फिर से इक अम्न की अफ़्वाह उड़ा दी जाए

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तीर मत देख मिरे ज़ख़्म को देख

यार-ए-यार अपना अदू में गुम है

इस आजिज़ी से किया उस ने मेरे सर का सवाल

ख़ुद अपने हाथ से तलवार तोड़ दी मैं ने

रेत पर वो पड़ी है मुश्क कोई

तीर भी और कमान सा कुछ है

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