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Shehzad Anjum Burhani's Photo'

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

1986 | बुरहानपुर, भारत

नई नस्ल के अहम शाइरों में शुमार

नई नस्ल के अहम शाइरों में शुमार

शहज़ाद अंजुम बुरहानी के शेर

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आज की रात है बहुत भारी

आज की रात बस गुज़र जाए

अभी से फ़ल्सफ़ा-ए-रेग-ज़ार की बातें

अभी तो 'इश्क़ के मकतब में हाज़िरी हुई है

बुलंदी से उतारा जा रहा हूँ

मैं तारीफ़ों से मारा जा रहा हूँ

ज़माना जिन की क़यादत में गामज़न था वो लोग

भटक गए तिरी आँखों की रहनुमाई में

वो फूल है तो उसे जान तक करो महसूस

वो चाँद है तो अंधेरा बढ़ा के देखा जाए

माजरा-ख़ेज़ कल इक ख़्वाब था देखा हम ने

बीच दरिया में थे कश्ती से उतरते हुए लोग

दिल की ही किसी बात को तहरीर कर पाए

लिखने पे जब आए थे तो क्या क्या नहीं लिक्खा

'अर्ज़ी इंसाफ़ की हम ने भी लगा रक्खी है

देखिए ज़िल्ल-ए-इलाही हमें कब पूछते हैं

किन गुज़रगाहों के हैं गर्द-ओ-ग़ुबार आँखों में

रोज़ पतझड़ के हमें ख़्वाब दिखाती है हवा

'अंजुम' आ'साब सँभालो है यही रंग-ए-बहार

बू-ए-शौक़ आने लगी यार की अंगड़ाई से

वहाँ भी कोई नहीं था ख़राब-हालों का

मैं हो के मिम्बर-ओ-मेहराब से निकल आया

चाँद कुछ देर तेरी छत पे रहे

फिर मिरे जाम में उतर जाए

ये क्या कि ख़यालों से उड़ी जाती है ख़ुशबू

मैं ने तो अभी तक उसे सोचा भी नहीं है

अता-ए-शान-ए-करीमी 'अजीब होती है

किनारा ख़ुद ही तह-ए-आब से निकल आया

बुझे शरर हैं हवा-ए-विसाल की ज़द पर

तिरी नज़र का इशारा बता रहा है मुझे

आस्तीन में ख़ंजर लब पे शीरीनी

ये कैसे 'अक़्ल के दुश्मन से दोस्ती हुई है

तुनुक-मिज़ाज है मलहूज़ यूँ अदब रखना

बहुत सँभल के तुम उस के लबों पे लब रखना

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