शहज़ाद अंजुम बुरहानी के शेर
आज की रात है बहुत भारी
आज की रात बस गुज़र जाए
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अभी से फ़ल्सफ़ा-ए-रेग-ज़ार की बातें
अभी तो 'इश्क़ के मकतब में हाज़िरी हुई है
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बुलंदी से उतारा जा रहा हूँ
मैं तारीफ़ों से मारा जा रहा हूँ
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ज़माना जिन की क़यादत में गामज़न था वो लोग
भटक गए तिरी आँखों की रहनुमाई में
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वो फूल है तो उसे जान तक करो महसूस
वो चाँद है तो अंधेरा बढ़ा के देखा जाए
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माजरा-ख़ेज़ कल इक ख़्वाब था देखा हम ने
बीच दरिया में थे कश्ती से उतरते हुए लोग
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दिल की ही किसी बात को तहरीर न कर पाए
लिखने पे जब आए थे तो क्या क्या नहीं लिक्खा
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'अर्ज़ी इंसाफ़ की हम ने भी लगा रक्खी है
देखिए ज़िल्ल-ए-इलाही हमें कब पूछते हैं
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किन गुज़रगाहों के हैं गर्द-ओ-ग़ुबार आँखों में
रोज़ पतझड़ के हमें ख़्वाब दिखाती है हवा
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'अंजुम' आ'साब सँभालो है यही रंग-ए-बहार
बू-ए-शौक़ आने लगी यार की अंगड़ाई से
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वहाँ भी कोई नहीं था ख़राब-हालों का
मैं हो के मिम्बर-ओ-मेहराब से निकल आया
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चाँद कुछ देर तेरी छत पे रहे
फिर मिरे जाम में उतर जाए
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ये क्या कि ख़यालों से उड़ी जाती है ख़ुशबू
मैं ने तो अभी तक उसे सोचा भी नहीं है
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अता-ए-शान-ए-करीमी 'अजीब होती है
किनारा ख़ुद ही तह-ए-आब से निकल आया
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बुझे शरर हैं हवा-ए-विसाल की ज़द पर
तिरी नज़र का इशारा बता रहा है मुझे
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न आस्तीन में ख़ंजर न लब पे शीरीनी
ये कैसे 'अक़्ल के दुश्मन से दोस्ती हुई है
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तुनुक-मिज़ाज है मलहूज़ यूँ अदब रखना
बहुत सँभल के तुम उस के लबों पे लब रखना
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