सुजीत सहगल हासिल
ग़ज़ल 18
अशआर 11
देख तेरी सोहबतों का क्या असर आया है आज
एक आवारा परिंदा फिर से घर आया है आज
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उन को हर ज़ुल्म पर दु'आएँ दीं
सब्र की और इंतिहा क्या है
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मुझ को जोड़ा है तोड़ कर ख़ुद को
उस ने मुझ को बिखरता पाया जब
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कल तक जो कुछ न था मिरा ईमान हो गया
इक 'आम आदमी से मैं इंसान हो गया
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