Suroor Barabankvi's Photo'

सुरूर बाराबंकवी

1919 - 1980 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 18

नज़्म 2

 

शेर 2

जिन से मिल कर ज़िंदगी से इश्क़ हो जाए वो लोग

आप ने शायद देखे हों मगर ऐसे भी हैं

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हम लोग उलझे हैं उलझेंगे किसी से

हम को तो हमारा ही गरेबान बहुत है

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क़ितआ 1

 

पुस्तकें 2

Aab-o-Gil,Dhaka

February

1958

Aab-o-Gil,Dhaka

March-April

1958

 

चित्र शायरी 2

जिन से मिल कर ज़िंदगी से इश्क़ हो जाए वो लोग आप ने शायद न देखे हों मगर ऐसे भी हैं

यही नहीं कि मिरा दिल ही मेरे बस में न था जो तू मिला तो में ख़ुद अपनी दस्तरस में न था ब-नाम-ए-अहद-ए-रिफ़ाक़त भी हम-क़दम न हुआ ये हौसला मिरे मासूम हम-नफ़स में न था अजीब सेहर का आलम था उस की क़ुर्बत में वो मेरे पास था और मेरी दस्तरस में न था न जाने क़ाफ़िला-ए-अहल-ए-दिल पे क्या गुज़री ये इज़्तिराब कभी नाला-ए-जरस में न था ख़बर तो होगी तुझे तेरे जाँ-निसारों में कोई तो था सर-ए-मक़्तल जो पेश-ओ-पस में न था 'सुरूर' अपने चमन की फ़ज़ा है क्या कहिए सुकूत का तो वो आलम है जो क़फ़स में न था

 

वीडियो 12

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

सुरूर बाराबंकवी

ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ

सुरूर बाराबंकवी

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

सुरूर बाराबंकवी

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़-ए-यार के

सुरूर बाराबंकवी

ज़िंदगी में लग चुका था ग़म का सरमाया बहुत

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तू जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

न किसी को फ़िक्र-ए-मंज़िल न कहीं सुराग़-ए-जादा

सुरूर बाराबंकवी

फ़स्ल-ए-गुल क्या कर गई आशुफ़्ता सामानों के साथ

सुरूर बाराबंकवी

यही नहीं कि मिरा दिल ही मेरे बस में न था

सुरूर बाराबंकवी

वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए

सुरूर बाराबंकवी

हाल में अपने मगन हो फ़िक्र-ए-आइंदा न हो

सुरूर बाराबंकवी

ऑडियो 6

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़-ए-यार के

दस्त-ओ-पा हैं सब के शल इक दस्त-ए-क़ातिल के सिवा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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