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सुरूर बाराबंकवी

1927 - 1980 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 18

नज़्म 2

 

शेर 2

जिन से मिल कर ज़िंदगी से इश्क़ हो जाए वो लोग

आप ने शायद देखे हों मगर ऐसे भी हैं

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हम लोग उलझे हैं उलझेंगे किसी से

हम को तो हमारा ही गरेबान बहुत है

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क़ितआ 1

 

वीडियो 11

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

सुरूर बाराबंकवी

ऐ जुनूँ कुछ तो खुले आख़िर मैं किस मंज़िल में हूँ

सुरूर बाराबंकवी

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

सुरूर बाराबंकवी

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़-ए-यार के

सुरूर बाराबंकवी

ज़िंदगी में लग चुका था ग़म का सरमाया बहुत

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तू जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

न किसी को फ़िक्र-ए-मंज़िल न कहीं सुराग़-ए-जादा

सुरूर बाराबंकवी

फ़स्ल-ए-गुल क्या कर गई आशुफ़्ता सामानों के साथ

सुरूर बाराबंकवी

यही नहीं कि मिरा दिल ही मेरे बस में न था

सुरूर बाराबंकवी

वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए

सुरूर बाराबंकवी

ऑडियो 6

और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात

कभी अपने इश्क़ पे तब्सिरे कभी तज़्किरे रुख़-ए-यार के

दस्त-ओ-पा हैं सब के शल इक दस्त-ए-क़ातिल के सिवा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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