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ताहिर अज़ीम

1978 | बहरैन

ग़ज़ल 9

शेर 14

जो तिरे इंतिज़ार में गुज़रे

बस वही इंतिज़ार के दिन थे

शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूँ

ज़ेहन में पर गाँव का नक़्शा रखा है

ये जो माज़ी की बात करते हैं

सोचते होंगे हाल से आगे

मुझ को भी हक़ है ज़िंदगानी का

मैं भी किरदार हूँ कहानी का

बरसों पहले जिस दरिया में उतरा था

अब तक उस की गहराई है आँखों में

पुस्तकें 1

Kulliyat-e-Saeed Qais

 

2016