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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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Tahir Azeem's Photo'

ताहिर अज़ीम

1978 | बहरैन

ताहिर अज़ीम

ग़ज़ल 21

नज़्म 1

 

अशआर 14

जो तिरे इंतिज़ार में गुज़रे

बस वही इंतिज़ार के दिन थे

शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूँ

ज़ेहन में पर गाँव का नक़्शा रखा है

ये जो माज़ी की बात करते हैं

सोचते होंगे हाल से आगे

मुझ को भी हक़ है ज़िंदगानी का

मैं भी किरदार हूँ कहानी का

सोच अपनी ज़ात तक महदूद है

ज़ेहन की क्या ये तबाही कुछ नहीं

पुस्तकें 1

 

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