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तसनीम आबिदी के शेर

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ख़ुदा के नाम पे जिस तरह लोग मर रहे हैं

दुआ करो कि अकेला ख़ुदा रह जाए

जंगों में थी मैं माल-ए-ग़नीमत के तौर पे

मेरे लिए कभी मुझे बाँटा नहीं गया

हम को ख़ुद में क़ियाम करना था

वर्ना रस्ते पड़े थे क़दमों में

इस बार मदीने में ही दर आया था कूफ़ा

इस बार किया हम ने सफ़र और तरह का

कुछ चाँदनी उदास थी कुछ दिल भी था उदास

कल रात कर्ब-ए-ज़ात भी हद से सिवा हुआ

शहर-आशोब में किरदार नए हैं लेकिन

ये कहानी हमें पहले भी सुनाई गई है

तू इक पयादे को शह-मात देना चाहता है

मैं हार मान गई अपनी चाल रहने दे

राइगानी की 'अजब शक्ल दिखाई गई है

एक तस्वीर जो पानी पे बनाई गई है

इस बार हुआ कुन का असर और तरह का

इस बार है इम्कान-ए-बशर और तरह का

सुकूत-ए-‘अस्र में गूँजी हुई अज़ान हूँ मैं

बहुत से कुर्सी-नशीनों के दरमियान हूँ मैं

इक अज़ाँ और नमाज़ का वक़्फ़ा

ज़िंदगी कितनी मुख़्तसर पाई

शिकस्त-ए-‘अहद-ए-तमन्ना की क्या शिकायत हो

हमारे ख़्वाब ही हम से गुरेज़-पा निकले

मैं राख होने को हूँ तू मिरी चमक पे जा

चराग़ बुझने से पहले भड़कने लगता है

हमारे शे'र नग़्मे और सज्दे

अदा जो हो पाए क्या हुए वो

सोचा नहीं गया कभी समझा नहीं गया

तारीख़ में कभी मुझे लिक्खा नहीं गया

है तमाशे का इख़्तिताम यही

जब तमाशा बने तमाशाई

कोई क्या बताए कि ज़ीस्त में कशिश रही मज़ा रहा

जो गुज़र गया वो शबाब था जो बिखर गया वो जमाल था

दश्त-ए-दिल में कभी इक नाक़ा-सवार आया था

आज तक मुझ में बहुत गर्द उड़ा करती है

सुब्ह बे-नूर है शाम बे-कैफ़ है कैसी हालत में है मुब्तला ज़िंदगी

रोज़-ओ-शब में कहाँ लुत्फ़ बाक़ी रहा ऐसे जीने में क्या है मज़ा ज़िंदगी

सब चले जाएँगे इक बे-नाम मंज़िल की तरफ़

घर की तख़्ती की जगह कतबे लगे रह जाएँगे

झील में बस एक कंकर फेंक कर

दाएरे की गूँज मैं सुनती रही

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