Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Vijay Sharma's Photo'

विजय शर्मा

1995 | मुंबई, भारत

नई पीढ़ी के अहम शायरों में शुमार, शायरी में इन्सानी जज़्बात, रिश्तों की गहराई, और ज़िंदगी की पेचीदगियों का दिलकश संगम

नई पीढ़ी के अहम शायरों में शुमार, शायरी में इन्सानी जज़्बात, रिश्तों की गहराई, और ज़िंदगी की पेचीदगियों का दिलकश संगम

विजय शर्मा का परिचय

मूल नाम : विजय शर्मा

जन्म : 29 May 1995 | हावड़ा, पश्चिम बंगाल

संबंधी : क़ैसर शमीम (गुरु)

ये बहस छोड़ के कितनी हसीन है दुनिया

तू ये बता कि तेरा दिल कहीं लगा कि नहीं

विजय शर्मा 10 अक्टूबर 1995 को कोलकाता में पैदा हुए। उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से भौतिकी में बी.एससी. की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने अपने गृह नगर में फिल्म इंडस्ट्री में काम करना शुरू किया और एक स्क्रिप्ट लेखक और सहायक निर्देशक के रूप में कार्य किया।
वो 2016 में दिल्ली चले गए और तब से दो शॉर्ट फिल्में निर्देशित की हैं। उनकी फिल्में उनकी शायरी से प्रेरित हैं, और उनकी शायरी में दृश्यात्मक भव्यता का अद्वितीय अहसास देखने को मिलता है।
वो ग़ज़लें और कहानियाँ लिखते हैं, जो प्रमुख साहित्यिक जर्नल्स में नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं। उन्होंने रेख़्ता फाउंडेशन में लगभग तीन साल सोशल मीडिया संपादक और संपादकीय कार्यकारी के रूप में भी काम किया है
विजय शर्मा, एक अहम नौजवान शायर, समकालीन हिन्दी और उर्दू शायरी में एक ताबिंदा आवाज़ हैं। उनकी शायरी इन्सानी जज़्बात, रिश्तों और मौजूदा ज़िंदगी की पेचीदगियों की गहरी समझ को मुनअकिस करती है। सादगी और गहराई के ख़ूबसूरत इम्तिज़ाज के साथ, विजय शर्मा ऐसे अशआर तख़लीक़ करते हैं जो क़ारी के दिलों को छू जाते हैं। वो अपने अशआर में मोहब्बत, जुदाई, उम्मीद और ख़ुद एहतिसाबी के जज़्बात को उभारते हैं।
ग़ज़ल के फ़न में महारत रखने वाले इस बेहतरीन शायर की शायरी अक्सर ख़ूबसूरती, दर्द, और ज़िंदगी में मानी की अबदी तलाश जैसे मौज़ूआत को उजागर करती है। उनका इस्तेमाल करदा इस्तिआरा और तस्वीरी ज़बान उनके अल्फ़ाज़ में जान डाल देती है, और जज़्बात और एहसासात का एक ऐसा ज़िंदा नक़्शा तख़लीक़ करती है जो सामईन के दिलों में गहराई तक उतर जाता है। चाहे वो अनकही मोहब्बत के नाज़ुक पहलूओं को बयान करें या समाजी मसाइल के बड़े कैनवस को, विजय शर्मा की शायरी एक लाज़वाल कशिश पेश करती है जो अक्सर लोगों को मुतअस्सिर करती और जोड़ती रहती है।

संबंधित टैग

Recitation

बोलिए