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वहशत रज़ा अली कलकत्वी

1881 - 1956 | कोलकाता, भारत

बंगाल के प्रमुख उत्तर – क्लासिकी शायर

बंगाल के प्रमुख उत्तर – क्लासिकी शायर

ग़ज़ल 49

शेर 54

ज़मीं रोई हमारे हाल पर और आसमाँ रोया

हमारी बेकसी को देख कर सारा जहाँ रोया

निशान-ए-मंज़िल-ए-जानाँ मिले मिले मिले

मज़े की चीज़ है ये ज़ौक़-ए-जुस्तुजू मेरा

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ज़ालिम की तो आदत है सताता ही रहेगा

अपनी भी तबीअत है बहलती ही रहेगी

रुबाई 3

 

ई-पुस्तक 7

Dabistan-e-Wahdat Ka Tanqeedi Mutala

 

1989

Deewan-e-Wahshat

 

 

मज़ामीन-ए-वहशत

 

1982

Nassakh Se Wahshat Tak

 

1959

Tarana-e-Wahshat

 

1951

वहशत: हयात और फ़न

 

2010

शुमारा नम्बर-009

1957

 

ऑडियो 15

ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा

कहते हो अब मिरे मज़लूम पे बेदाद न हो

चला जाता है कारवान-ए-नफ़स

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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