वज़ीर आग़ा
लेख 23
अशआर 34
वो ख़ुश-कलाम है ऐसा कि उस के पास हमें
तवील रहना भी लगता है मुख़्तसर रहना
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खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी
किताब मेरी थी रंग-ए-किताब उस का था
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इतना न पास आ कि तुझे ढूँडते फिरें
इतना न दूर जा के हमा-वक़्त पास हो
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या अब्र-ए-करम बन के बरस ख़ुश्क ज़मीं पर
या प्यास के सहरा में मुझे जीना सिखा दे
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उस की आवाज़ में थे सारे ख़द-ओ-ख़ाल उस के
वो चहकता था तो हँसते थे पर-ओ-बाल उस के
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