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ज़फ़र सहबाई

1946 | भोपाल, भारत

ग़ज़ल 15

शेर 7

जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन

ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूँ

दिलों के बीच दीवार है सरहद है

दिखाई देते हैं सब फ़ासले नज़र के मुझे

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ख़ुदा-ए-अम्न जो कहता है ख़ुद को

ज़मीं पर ख़ुद ही मक़्तल लिख रहा है

ई-पुस्तक 3

Dhoop Ke Phool

 

1977

Lafzon Ke parindey

 

 

नग़्मा-ए-शुऊर

 

1967

 

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