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ज़हीर रहमती

1968 | दिल्ली, भारत

ज़हीर रहमती के शेर

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जिस की कुछ ताबीर हो

ख़्वाब उसी को कहते हैं

सदियों में कोई एक मोहब्बत होती है

बाक़ी तो सब खेल तमाशा होता है

और एहसास-ए-जिहालत बढ़ गया

किस क़दर पढ़ लिख के जाहिल हो गए

ज़माने भर को है उम्मीद उसी से

वो ना-उम्मीद ऐसा कर रहा है

ख़ुशी से अपना घर आबाद कर के

बहुत रोएँगे तुम को याद कर के

ज़र्द चेहरे को बड़े शौक़ से सब देखते हैं

टूटने वाले हैं सरसब्ज़ शजर से हम भी

सतही लोगों में गहराई होती है

ये डूबे तो पानी गहरा होता है

यूँ ही हम दर्द अपना खो रहे हैं

यही रोना है हम क्यूँ रो रहे हैं

किसी दिन उक़्दा-ए-मुश्किल भी खुलता

कभी हम पर भी तुम आसान होते

कुछ होते होते इक दिन ये हुआ

सैकड़ों सदियों का हासिल हो गए

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