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ज़ाहिदा ज़ैदी

1930 - 2011 | अलीगढ़, भारत

भारत की अग्रणी शायरात में विख्यात।

भारत की अग्रणी शायरात में विख्यात।

मुड़ के देखा तो हमें छोड़ के जाती थी हयात

हम ने जाना था कोई बोझ गिरा है सर से

ज़िंदगी तू ने तो सच है कि वफ़ा हम से की

हम मगर ख़ुद तुझे ठुकराएँ ज़रूरी तो नहीं

कभी इश्क़ साज़-ए-हयात था कभी सोज़-ए-दिल ने जला दिया

कभी वस्ल में भी कसक रही कभी दर्द-ओ-ग़म ने भी मज़ा दिया

हमीं से अंजुमन-ए-इश्क़ मो'तबर ठहरी

हमीं को सौंपी गई ग़म की पासबानी भी

ख़्वाब तो ख़्वाब हैं पल भर में बिखर जाते हैं

सच तो ये है कि बस इक काहिश-ए-जाँ रक़्स में है